दिखाओ सूरत-ए-ताज़ा बयान से पहले
कहानी और है कुछ दास्तान से पहले
ओबैदुर् रहमान
घटती बढ़ती रही परछाईं मिरी ख़ुद मुझ से
लाख चाहा कि मिरे क़द के बराबर उतरे
ओबैदुर् रहमान
हमें हिजरत समझ में इतनी आई
परिंदा आब-ओ-दाना चाहता है
ओबैदुर् रहमान
हमें तो ख़्वाब का इक शहर आँखों में बसाना था
और इस के बा'द मर जाने का सपना देख लेना था
ओबैदुर् रहमान
जब धूप सर पे थी तो अकेला था में 'उबैद'
अब छाँव आ गई है तो सब यार आए हैं
ओबैदुर् रहमान
जहाँ पहुँचने की ख़्वाहिश में उम्र बीत गई
वहीं पहुँच के हयात इक ख़याल-ए-ख़ाम हुई
ओबैदुर् रहमान
कोई दिमाग़ से कोई शरीर से हारा
में अपने हाथ की अंधी लकीर से हारा
ओबैदुर् रहमान

