मैं उस को भूल गया हूँ वो मुझ को भूल गया
तो फिर ये दिल पे क्यूँ दस्तक सी ना-गहानी हुई
उबैदुल्लाह अलीम
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मुझ से मिरा कोई मिलने वाला
बिछड़ा तो नहीं मगर मिला दे
उबैदुल्लाह अलीम
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पलट सकूँ ही न आगे ही बढ़ सकूँ जिस पर
मुझे ये कौन से रस्ते लगा गया इक शख़्स
उबैदुल्लाह अलीम
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फिर इस तरह कभी सोया न इस तरह जागा
कि रूह नींद में थी और जागता था मैं
उबैदुल्लाह अलीम
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रौशनी आधी इधर आधी उधर
इक दिया रक्खा है दीवारों के बीच
उबैदुल्लाह अलीम
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शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ
धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ
उबैदुल्लाह अलीम
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शायद कि ख़ुदा में और मुझ में
इक जस्त का और फ़ासला है
उबैदुल्लाह अलीम
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