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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

कल बोसा-ए-पा हम ने लिया था सो न आया
शायद कि वो बोसा ही हुआ आबला-ए-पा

नज़ीर अकबराबादी




कल 'नज़ीर' उस ने जो पूछा ब-ज़बान-ए-पंजाब
नेह विच मेंडी ए की हाल-ए-तुसादा वे मियाँ

नज़ीर अकबराबादी




कल शब-ए-वस्ल में क्या जल्द बजी थीं घड़ियाँ
आज क्या मर गए घड़ियाल बजाने वाले

नज़ीर अकबराबादी




कमाल-ए-इश्क़ भी ख़ाली नहीं तमन्ना से
जो है इक आह तो उस को भी है असर की तलब

नज़ीर अकबराबादी




ख़फ़ा देखा है उस को ख़्वाब में दिल सख़्त मुज़्तर है
खिला दे देखिए क्या क्या गुल-ए-ताबीर-ए-ख़्वाब अपना

नज़ीर अकबराबादी




ख़ुदा के वास्ते गुल को न मेरे हाथ से लो
मुझे बू आती है इस में किसी बदन की सी

नज़ीर अकबराबादी




किस को कहिए नेक और ठहराइए किस को बुरा
ग़ौर से देखा तो सब अपने ही भाई-बंद हैं

नज़ीर अकबराबादी