गए थे मिलने को शायद झिड़क दिया उस ने
मियाँ 'नज़ीर' तो कुछ शर्मसार आते हैं
नज़ीर अकबराबादी
ग़रज़ न सर की ख़बर थी न पा का होश 'नज़ीर'
सिरहाना पाएंती और पाएंती सिरहाना था
नज़ीर अकबराबादी
ग़श खा के गिरा पहले ही शोले की झलक से
मूसा को भला कहिए तो क्या तूर की सूझी
नज़ीर अकबराबादी
गो सफ़ेदी मू की यूँ रौशन है जूँ आब-ए-हयात
लेकिन अपनी तो इसी ज़ुल्मात से थी ज़िंदगी
नज़ीर अकबराबादी
है दसहरे में भी यूँ गर फ़रहत-ओ-ज़ीनत 'नज़ीर'
पर दिवाली भी अजब पाकीज़ा-तर त्यौहार है
नज़ीर अकबराबादी
हम हाल तो कह सकते हैं अपना प कहें क्या
जब वो इधर आते हैं तो तन्हा नहीं आते
नज़ीर अकबराबादी
हम वो दरख़्त हैं कि जिसे दम-ब-दम अजल
अर्रह इधर दिखाती है ऊधर तबर क़ज़ा
नज़ीर अकबराबादी

