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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

कितना तनिक सफ़ा है कि पा-ए-निगाह का
हल्का सा इक ग़ुबार है चेहरे के रंग पर

नज़ीर अकबराबादी




कोई तो पगड़ी बदलता है औरों से लेकिन
मियाँ 'नज़ीर' हम अब तुम से तन बदलते हैं

नज़ीर अकबराबादी




कुछ हम को इम्तियाज़ नहीं साफ़ ओ दुर्द का
ऐ साक़ियान-ए-बज़्म बयारीद हरचे हस्त

नज़ीर अकबराबादी




कूचे में उस के बैठना हुस्न को उस के देखना
हम तो उसी को समझे हैं बाग़ भी और बहार भी

नज़ीर अकबराबादी




क्यूँ नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बे-ख़बर
क्या तिरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम

नज़ीर अकबराबादी




लिख लिख के 'नज़ीर' इस ग़ज़ल-ए-ताज़ा को ख़ूबाँ
रख लेंगे किताबों में ये रंग-ए-पर-ए-ताएर

नज़ीर अकबराबादी




मय पी के जो गिरता है तो लेते हैं उसे थाम
नज़रों से गिरा जो उसे फिर किस ने सँभाला

नज़ीर अकबराबादी