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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

समझाएँ किस तरह दिल-ए-ना-कर्दा-कार को
ये दोस्ती समझता है दुश्मन के प्यार को

मुबारक अज़ीमाबादी




शिकस्त-ए-तौबा की तम्हीद है तिरी तौबा
ज़बाँ पे तौबा 'मुबारक' निगाह साग़र पर

मुबारक अज़ीमाबादी




तौबा की रिंदों में गुंजाइश कहाँ
जब ये आएगी निकाली जाएगी

मुबारक अज़ीमाबादी




तेरी बख़्शिश के भरोसे पे ख़ताएँ की हैं
तेरी रहमत के सहारे ने गुनहगार किया

मुबारक अज़ीमाबादी




तिरी अदा की क़सम है तिरी अदा के सिवा
पसंद और किसी की हमें अदा न हुई

मुबारक अज़ीमाबादी




तुम भूल गए मुझ को यूँ याद दिलाता हूँ
जो आह निकलती है वो याद-दहानी है

मुबारक अज़ीमाबादी




तुम को समझाए 'मुबारक' कोई क्यूँकर अफ़्सोस
तुम तो रोने लगे यार और भी समझाने से

मुबारक अज़ीमाबादी