EN اردو
तुम्हारी शर्त-ए-मोहब्बत कभी वफ़ा न हुई | शाही शायरी
tumhaari shart-e-mohabbat kabhi wafa na hui

ग़ज़ल

तुम्हारी शर्त-ए-मोहब्बत कभी वफ़ा न हुई

मुबारक अज़ीमाबादी

;

तुम्हारी शर्त-ए-मोहब्बत कभी वफ़ा न हुई
ये क्या हुई तुम्हीं कह दो अगर जफ़ा न हुई

क़दम क़दम पे क़दम लड़खड़ाए जाते थे
तमाम उम्र भी तय मंज़िल-ए-वफ़ा न हुई

तुम्हीं कहो तुम्हें ना-आश्ना कहें न कहें
कि आश्ना से अदा रस्म-ए-आश्ना न हुई

तिरी अदा की क़सम है तिरी अदा के सिवा
पसंद और किसी की हमें अदा न हुई

हमीं को देख के ख़ंजर निकालते थे आप
हमारे बाद तो ये रस्म फिर अदा न हुई

ख़ुदा ने रख लिया नाज़ ओ नियाज़ का पर्दा
कि रोज़-ए-हश्र मिरी उन की बरमला न हुई