गवाही देता वही मेरी बे-गुनाही की
वो मर गया तो उसे अब कहाँ से लाऊँ मैं
मोहम्मद अल्वी
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ग़ज़ल कही है कोई भाँग तो नहीं पी है
मुशाइरे में तरन्नुम से क्यूँ सुनाऊँ मैं
मोहम्मद अल्वी
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घर में क्या आया कि मुझ को
दीवारों ने घेर लिया है
मोहम्मद अल्वी
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घर में सामाँ तो हो दिलचस्पी का
हादसा कोई उठा ले जाऊँ
मोहम्मद अल्वी
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घर ने अपना होश सँभाला दिन निकला
खिड़की में भर गया उजाला दिन निकला
मोहम्मद अल्वी
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गुल-दान में गुलाब की कलियाँ महक उठीं
कुर्सी ने उस को देख के आग़ोश वा किया
मोहम्मद अल्वी
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हाए वो लोग जो देखे भी नहीं
याद आएँ तो रुला देते हैं
मोहम्मद अल्वी

