बत्ती बुझा के हीरो हीरोइन लिपट गए
क़िस्सा बहुत ही फिर तो मज़ेदार हो गया
मोहम्मद अल्वी
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बिछड़ते वक़्त ऐसा भी हुआ है
किसी की सिसकियाँ अच्छी लगी हैं
मोहम्मद अल्वी
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बिखेर दे मुझे चारों तरफ़ ख़लाओं में
कुछ इस तरह से अलग कर कि जुड़ न पाऊँ मैं
मोहम्मद अल्वी
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बिना मुर्ग़े के पर झटकती हैं
मुर्ग़ियाँ दर-ब-दर भटकती हैं
मोहम्मद अल्वी
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बुला रहा था कोई चीख़ चीख़ कर मुझ को
कुएँ में झाँक के देखा तो मैं ही अंदर था
मोहम्मद अल्वी
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चला जाऊँगा जैसे ख़ुद को तन्हा छोड़ कर 'अल्वी'
मैं अपने आप को रातों में उठ कर देख लेता हूँ
मोहम्मद अल्वी
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छोड़ गया मुझ को 'अल्वी'
शायद वो जल्दी में था
मोहम्मद अल्वी
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