ख़ुद अपने क़त्ल का इल्ज़ाम ढो रहा हूँ अभी
मैं अपनी लाश पे सर रख के रो रहा हूँ अभी
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
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क्या पता जाने कहाँ आग लगी
हर तरफ़ सिर्फ़ धुआँ है मुझ में
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
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मैं अधूरा सा हूँ उस के अंदर
और वो शख़्स मुकम्मल मुझ में
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
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मैं ही आईना-ए-दुनिया में चला आया हूँ
या चली आई है दुनिया मिरे आईने में
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
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मैं ने कैसे कैसे मोती ढूँडे हैं
लेकिन तेरे आगे सब कुछ पत्थर है
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
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मेरी आँखों से भी इक बार निकल
देखूँ मैं तेरी रवानी पानी
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
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मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए
मैं तो हर वक़्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ
मिर्ज़ा अतहर ज़िया

