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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

ये बतलाओ हम को भी पहचानते हो
हमें क्या जो हो सारे आलम से वाक़िफ़

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम




ये भी न पूछा तुम ने 'अंजुम' जीता है या मरता है
वाह-जी-वा आशिक़ से कोई ऐसी ग़फ़लत करता है

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम




ये है आवारा-तबीअत और वो नाज़ुक-मिज़ाज
मैं दिल-ए-वारफ़्ता नज़्र-ए-यार कर सकता नहीं

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम




देखते रहते हैं ख़ुद अपना तमाशा दिन रात
हम हैं ख़ुद अपने ही किरदार के मारे हुए लोग

मिर्ज़ा अतहर ज़िया




एक दरिया को दिखाई थी कभी प्यास अपनी
फिर नहीं माँगा कभी मैं ने दोबारा पानी

मिर्ज़ा अतहर ज़िया




हरीम-ए-दिल में ठहर या सरा-ए-जान में रुक
ये सब मकान हैं तेरे किसी मकान में रुक

मिर्ज़ा अतहर ज़िया




जश्न होता है वहाँ रात ढले
वो जो इक ख़ाली मकाँ है मुझ में

मिर्ज़ा अतहर ज़िया