न इंतिज़ार करो कल का आज दर्ज करो
ख़मोशी तोड़ दो और एहतिजाज दर्ज करो
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
तमाम शहर में बिखरा पड़ा है मेरा वजूद
कोई बताए भला किस तरह चुनूँ ख़ुद को
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
तेरी दहलीज़ पे इक़रार की उम्मीद लिए
फिर खड़े हैं तिरे इंकार के मारे हुए लोग
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
तू ने ऐ वक़्त पलट कर भी कभी देखा है
कैसे हैं सब तिरी रफ़्तार के मारे हुए लोग
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
शह-ज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले
मिर्ज़ा अज़ीम बेग 'अज़ीम'
ऐ मुसव्विर शिताब हो कि अभी
उस का नक़्शा धियान में कुछ है
मिर्ज़ा अज़फ़री
'अज़फ़री' ग़ुंचा-ए-दिल बंद और आई है बहार
सैर-ए-गुल को कि ये शायद ब-तकल्लुफ़ खिल ले
मिर्ज़ा अज़फ़री

