सदा चमन से जो आती है रोज़ चट चट की
बलाएँ ग़ुंचे तिरी सुब्ह ओ शाम लेते हैं
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
शब-ए-हिज्र जब ख़्वाब देखा ये देखा
कि तुझ को गले से लगाए हुए हैं
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
तेरी मर्ज़ी गर इसी में है कि हो दीदार-ए-आम
हम ने आँखों पर क़दम सारे ज़माने के लिए
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
थक गए हम तो फ़ुसूँ-साज़ियाँ करते करते
उस पे चलता नहीं मुतलक़ कोई गंडा तावीज़
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
तिरी तेग़ की आब जाती रही है
मिरे ज़ख़्म पानी चुराए हुए हैं
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
उन के आने में क्यूँ ख़लल डाला
सत्या-नास हो तिरा बदली
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
उन्हें हाल-ए-दिल किस तरह लिख के भेजें
न हम उन से वाक़िफ़ न वो हम से वाक़िफ़
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

