कुछ हो रहेगा इश्क़-ओ-हवस में भी इम्तियाज़
आया है अब मिज़ाज तिरा इम्तिहान पर
मीर तक़ी मीर
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कुछ करो फ़िक्र मुझ दीवाने की
धूम है फिर बहार आने की
मीर तक़ी मीर
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कुछ नहीं सूझता हमें उस बिन
शौक़ ने हम को बे-हवास किया
मीर तक़ी मीर
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क्या आज-कल से उस की ये बे-तवज्जोही है
मुँह उन ने इस तरफ़ से फेरा है 'मीर' कब का
मीर तक़ी मीर
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क्या जानूँ चश्म-ए-तर से उधर दिल को क्या हुआ
किस को ख़बर है 'मीर' समुंदर के पार की
मीर तक़ी मीर
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क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता
अब तो चुप भी रहा नहीं जाता
मीर तक़ी मीर
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लाया है मिरा शौक़ मुझे पर्दे से बाहर
मैं वर्ना वही ख़ल्वती-ए-राज़-ए-निहाँ हूँ
मीर तक़ी मीर
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