'मीर' साहब तुम फ़रिश्ता हो तो हो
आदमी होना तो मुश्किल है मियाँ
मीर तक़ी मीर
'मीर' उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है
मीर तक़ी मीर
आज क्या जाने वो क्यूँ आराम-ए-जाँ आया नहीं
हर्फ़-ए-रंजिश कल तो कोई दरमियाँ आया नहीं
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
बैठ कर मस्जिद में रिंदों से न इतना बिगड़ए
शैख़-जी आते हो मयख़ाने के भी अक्सर तरफ़
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
बेगानों ने कभी न वो कानों सुनाई बात
अफ़्सोस आश्ना ने जो आँखों दिखाई बात
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
देर तक ज़ब्त-ए-सुख़न कल उस में और हम में रहा
बोल उठे घबरा के जब आख़िर के तईं दम रुक गए
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
हम और फ़रहाद बहर-ए-इश्क़ में बाहम ही कूदे थे
जो उस के सर से गुज़रा आब मेरी ता-कमर आया
मिर्ज़ा अली लुत्फ़

