क्यूँ इन दिनों 'हसन' तू इतना झटक गया है
ज़ालिम कहीं तिरा दिल क्या फिर अटक गया है
मीर हसन
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लगाया मोहब्बत का जब याँ शजर
शजर लग गया और समर जल गया
मीर हसन
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मानिंद-ए-अक्स देखा उसे और न मिल सके
किस रू से फिर कहेंगे कि रोज़-ए-विसाल था
मीर हसन
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मैं भी इक मअनी-ए-पेचीदा अजब था कि 'हसन'
गुफ़्तुगू मेरी न पहुँची कभी तक़रीर तलक
मीर हसन
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मैं हश्र को क्या रोऊँ कि उठ जाते ही तेरे
बरपा हुई इक मुझ पे क़यामत तो यहीं और
मीर हसन
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मैं ने जो कहा मुझ पे क्या क्या न सितम गुज़रा
बोला कि अबे तेरा रोते ही जनम गुज़रा
मीर हसन
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मैं ने पाया न इसे शहर में न सहरा में
तू ने ले जा के मिरे दिल को कहाँ छोड़ दिया
मीर हसन
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