निगह उठी तो ज़माने के सामने तिरा रूप
पलक झुकी तो मिरे दिल के रू-ब-रू तिरा ग़म
मजीद अमजद
शायद इक भूली तमन्ना मिटते मिटते जी उठे
और भी इस जल्वा-ज़ार-ए-रंग-ओ-बू में घुमिए
मजीद अमजद
सुपुर्दगी में भी इक रम्ज़-ए-ख़ुद-निगह-दारी
वो मेरे दिल से मिरे वास्ते नहीं गुज़रे
मजीद अमजद
तिरे ख़याल के पहलू से उठ के जब देखा
महक रहा था ज़माने में चार-सू तिरा ग़म
मजीद अमजद
तिरी याद में जल्सा-ए-ता'ज़ियत
तुझे भूल जाने का आग़ाज़ था
मजीद अमजद
ये क्या तिलिस्म है ये किस की यासमीं बाँहें
छिड़क गई हैं जहाँ-दर-जहाँ गुलाब के फूल
मजीद अमजद
ज़िंदगी की राहतें मिलती नहीं मिलती नहीं
ज़िंदगी का ज़हर पी कर जुस्तुजू में घुमिए
मजीद अमजद

