थी जुनूँ-आमेज़ अपनी गुफ़्तुगू
बात मतलब की भी लेकिन कह गए
मैकश अकबराबादी
तिरी ज़ुल्फ़ों को क्या सुलझाऊँ ऐ दोस्त
मिरी राहों में पेच-ओ-ख़म बहुत हैं
मैकश अकबराबादी
ये मस्लक अपना अपना है ये फ़ितरत अपनी अपनी है
जलाओ आशियाँ तुम हम करेंगे आशियाँ पैदा
मैकश अकबराबादी
ज़बाँ पे नाम-ए-मोहब्बत भी जुर्म था यानी
हम उन से जुर्म-ए-मोहब्बत भी बख़्शवा न सके
मैकश अकबराबादी
ऐसे छूते हैं तसव्वुर में तुझे हम चुप-चाप
जैसे फूलों को छुआ करती है शबनम चुप-चाप
मजाज़ जयपुरी
कब का गुज़र चुका है दीवानगी का आलम
फिर भी 'मजाज़' अपना दामन रफ़ू करे है
मजाज़ जयपुरी
मेरी आँखें हैं तिरे हुस्न की गोया तस्वीर
मैं ने देखा है तिरे हुस्न का आलम चुप-चाप
मजाज़ जयपुरी

