करम के बाब में अपनों से इब्तिदा किया कर
ज़रा सी बात पे दिल को न यूँ बुरा किया कर
मजीद अख़्तर
रात भी चाँद भी समुंदर भी
मिल गए कितने ग़म-गुसार मुझे
मजीद अख़्तर
सारा हिसाब-ए-जान-ओ-दिल रक्खा है तेरे सामने
चाहे तो दे अमाँ मुझे चाहे तो दरगुज़र न कर
मजीद अख़्तर
ज़रा ठहरो कि पढ़ लूँ क्या लिखा मौसम की बारिश ने
मिरी दीवार पर लिखती रही है दास्ताँ वो भी
मजीद अख़्तर
बड़े सलीक़े से दुनिया ने मेरे दिल को दिए
वो घाव जिन में था सच्चाइयों का चरका भी
मजीद अमजद
चाँदनी में साया-हा-ए-काख़-ओ-कू में घूमिए
फिर किसी को चाहने की आरज़ू में घूमिए
मजीद अमजद
हाए वो ज़िंदगी फ़रेब आँखें
तू ने क्या सोचा मैं ने क्या समझा
मजीद अमजद

