मैं जब भी तज्ज़िया करता हूँ तेरा ऐ दुनिया
इस आईने में तुझे बद-चलन सी पाता हूँ
माजिद देवबंदी
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मेरी आँखें कुछ सोई सी रहती हैं
शायद इन का ख़्वाब-नगर से रिश्ता है
माजिद देवबंदी
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फिर तुम्हारे पाँव छूने ख़ुद बुलंदी आएगी
सब दिलों पर राज कर के ताज-दारी सीख लो
माजिद देवबंदी
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याद रक्खो इक न इक दिन साँप बाहर आएँगे
आस्तीनों में उन्हें कब तक छुपाया जाएगा
माजिद देवबंदी
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जज़्बों को ज़बान दे रहा हूँ
मैं वक़्त को दान दे रहा हूँ
माज़िद सिद्दीक़ी
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कौन अपना है इक ख़ुदा वो भी
रहने वाला है आसमानों का
माज़िद सिद्दीक़ी
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मिला है तख़्त किसे कौन तख़्त पर न रहा
ये बात और है जारी था जो सफ़र न रहा
माज़िद सिद्दीक़ी
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