अबस दिल बे-कसी पे अपनी अपनी हर वक़्त रोता है
न कर ग़म ऐ दिवाने इश्क़ में ऐसा ही होता है
ख़ान आरज़ू सिराजुद्दीन अली
जान तुझ पर कुछ ए'तिमाद नहीं
ज़िंदगानी का क्या भरोसा है
ख़ान आरज़ू सिराजुद्दीन अली
ख़ुद अपने दिल की सदा तेरी दस्तकों सी लगी
गुमाँ में था तेरा आना क़यास ऐसा था
ख़ान मोहम्मद ख़लील
पहले तो चंद लोग तरफ़-दार थे मिरे
फिर वो भी वक़्त था कि ख़ुदा भी उसी का था
ख़ान मोहम्मद ख़लील
तुम अपनी आस्तीं गर धो भी लोगे
पुकार उट्ठेगा ख़ंजर देख लेना
ख़ान मोहम्मद ख़लील
ये ख़द्द-ओ-ख़ाल ये गेसू ये सूरत-ए-ज़ेबा
सभी का हुस्न है अपनी जगह मगर आँखें
ख़ान रिज़वान
मैं सुनाता रहा दुखड़े 'ख़ावर'
और रोती रही शब भर दीवार
ख़ाक़ान ख़ावर

