तिरे सितम की ज़माना दुहाई देता है
कभी ये शोर तुझे भी सुनाई देता है
ख़ाक़ान ख़ावर
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वो सँवर सकता है माक़ूल भी हो सकता है
मेरा अंदाज़ा मिरी भूल भी हो सकता है
ख़ाक़ान ख़ावर
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ये रंग रंग परिंदे ही हम से अच्छे हैं
जो इक दरख़्त पे रहते हैं बेलियों की तरह
ख़ाक़ान ख़ावर
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यूँ हिरासाँ हैं मुसाफ़िर बस्तियों के दरमियाँ
हो गई हो शाम जैसे जंगलों के दरमियाँ
ख़ाक़ान ख़ावर
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बरहमी हुस्न को कुछ और जिला देती है
वो जमाली तेरा चेहरा वो जलाली आँखें
ख़ार देहलवी
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चश्म-ए-गिर्यां की आबयारी से
दिल के दाग़ों पे फिर बहार आई
ख़ार देहलवी
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चुपके से सह रहा हूँ सितम तेरे बेवफ़ा
मेरी ख़ता तो जब हो कि चूँ कर रहा हूँ मैं
ख़ार देहलवी
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