ख़मोशी में हर बात बन जाए है
जो बोले है दीवाना कहलाए है
कलीम आजिज़
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कुछ रोज़ से हम शहर में रुस्वा न हुए हैं
आ फिर कोई इल्ज़ाम लगाने के लिए आ
कलीम आजिज़
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क्या सितम है कि वो ज़ालिम भी है महबूब भी है
याद करते न बने और भुलाए न बने
कलीम आजिज़
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मय में कोई ख़ामी है न साग़र में कोई खोट
पीना नहीं आए है तो छलकाए चलो हो
कलीम आजिज़
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मैं मोहब्बत न छुपाऊँ तू अदावत न छुपा
न यही राज़ में अब है न वही राज़ में है
कलीम आजिज़
मरना तो बहुत सहल सी इक बात लगे है
जीना ही मोहब्बत में करामात लगे है
कलीम आजिज़
मौसम-ए-गुल हमें जब याद आया
जितना ग़म भूले थे सब याद आया
कलीम आजिज़
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