EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

सुनेगा कौन मेरी चाक-दामानी का अफ़्साना
यहाँ सब अपने अपने पैरहन की बात करते हैं

कलीम आजिज़




तल्ख़ियाँ इस में बहुत कुछ हैं मज़ा कुछ भी नहीं
ज़िंदगी दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

कलीम आजिज़




तपिश पतिंगों को बख़्श देंगे लहू चराग़ों में ढाल देंगे
हम उन की महफ़िल में रह गए हैं तो उन की महफ़िल सँभाल देंगे

कलीम आजिज़




तुझे संग-दिल ये पता है क्या कि दुखे दिलों की सदा है क्या
कभी चोट तू ने भी खाई है कभी तेरा दिल भी दुखा है क्या?

कलीम आजिज़




तुझे संग-दिल ये पता है क्या कि दुखे दिलों की सदा है क्या?
कभी चोट तू ने भी खाई है कभी तेरा दिल भी दुखा है क्या?

कलीम आजिज़




तुम्हें याद ही न आऊँ ये है और बात वर्ना
मैं नहीं हूँ दूर इतना कि सलाम तक न पहुँचे

कलीम आजिज़




तू रईस-ए-शहर-ए-सितम-गराँ मैं गदा-ए-कूचा-ए-आशिक़ाँ
तू अमीर है तो बता मुझे मैं ग़रीब हूँ तो बुरा है क्या

कलीम आजिज़