वो नहीं आज-कल ख़फ़ा हम से
कोई निकला है रास्ता शायद
जतीन्द्र वीर यख़मी ’जयवीर’
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हम जहाँ रहते हैं वो दश्त वो घर
दश्त लगते हैं न घर लगते हैं
जौहर मीर
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कोई मौसम भी सज़ा-वार-ए-मोहब्बत नहीं अब
ज़र्द पत्तों को हवाओं से शिकायत नहीं अब
जौहर मीर
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अजब शायर की आदत है कि जब बीड़ी जलाने को
किसी से माँगी माचिस तो जला कर जेब में रख ली
जौहर सीवानी
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हम रहे हैं मंज़िलों ही मंज़िलों में उम्र भर
जैसे क़िस्मत में किसी पहलू शकेबाई न थी
जौहर ज़ाहिरी
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वो लोग जो कि मआल-ए-चमन से वाक़िफ़ हैं
ख़िज़ाँ-नसीब गुलों की बहार क्या देखें
जौहर ज़ाहिरी
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आईनों को ज़ंग लगा
अब मैं कैसा लगता हूँ
जौन एलिया
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