तिरे फ़िराक़ के सदमे क़ुबूल हैं लेकिन
जफ़ा के ब'अद चले तो वफ़ा का दौर चले
जान काश्मीरी
उस को पता नहीं है ख़िज़ाँ के मिज़ाज का
वो वाक़िफ़-ए-बहार हुआ है अभी अभी
जान काश्मीरी
आए हैं सुनते कि ऐसा वक़्त भी आता है जब
हो दवा या फिर दुआ कुछ कारगर होता नहीं
जतीन्द्र वीर यख़मी ’जयवीर’
दुख कटे ज़हमत कटे कट जाए बद-हाली सभी
वक़्त काटे ना कटे तो क्या करें किस से कहें
जतीन्द्र वीर यख़मी ’जयवीर’
ख़ूब गहरी जो लगी चोट तो हम ने जाना
वक़्त लगता है किसी दर्द को जाते जाते
जतीन्द्र वीर यख़मी ’जयवीर’
लाख चाहा कि हो पहचान कोई अपनी भी
काश हम आप के ही नाम से जाने जाते
जतीन्द्र वीर यख़मी ’जयवीर’
मेरे ख़्वाबों के झरोकों को सजाते रहिए
न सही वस्ल मगर याद तो आते रहिए
जतीन्द्र वीर यख़मी ’जयवीर’

