तिरी पहली दीद के साथ ही वो फ़ुसूँ भी था
तुझे देख कर तुझे देखना मुझे आ गया
इक़बाल कौसर
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वो भी रो रो के बुझा डाला है अब आँखों ने
रौशनी देता था जो एक दिया अंदर से
इक़बाल कौसर
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ज़ियान-ए-दिल ही इस बाज़ार में सूद-ए-मोहब्बत है
यहाँ है फ़ाएदा ख़ुद को अगर नुक़सान में रख लें
इक़बाल कौसर
बंद आँखों में सारा तमाशा देख रहा था
रस्ता रस्ता मेरा रस्ता देख रहा था
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
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जब साया भी शीशे की तरह टूट गया
दीवार ने देखा ये तमाशा न कभी
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
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मैं नहीं मिलता किसी से
बंद फाटक बोलता है
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
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रोता है कोई किसी के ग़म में
सब अपने ही दुख बिचारते हैं
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
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