हैं घर की मुहाफ़िज़ मिरी दहकी हुई आँखें
मैं ताक़ में रख आया हूँ जलती हुई आँखें
इम्तियाज़ साग़र
होगा बहुत शदीद तमाज़त का इंतिक़ाम
साए से मिल के रोएगी दीवार देखना
इम्तियाज़ साग़र
उसी दरख़्त को मौसम ने बे-लिबास किया
मैं जिस के साए में थक कर उदास बैठा था
इम्तियाज़ साग़र
अब यूँ ही देखता हूँ रस्ता
मंज़िल पेश-ए-नज़र नहीं है
इम्तियाज़-उल-हक़ इम्तियाज़
गुज़री सवाल-ए-वस्ल के चक्कर में सारी उम्र
फ़ुर्सत न मिल सकी उसे गुफ़्त-ओ-शुनीद की
इनाम दुर्रानी
अपनी ही रवानी में बहता नज़र आता है
ये शहर बुलंदी से दरिया नज़र आता है
इनाम नदीम
बुझ जाएगा इक रोज़ तिरी याद का शोला
लेकिन मिरे सीने में धुआँ यूँ ही रहेगा
इनाम नदीम

