सुख़न के सारे सलीक़े ज़बाँ में रखता है
नहीं का अक्स निहाँ अपनी हाँ में रक्खा है
इनाम-उल-हक़ जावेद
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तमाम उम्र गँवा दी जिसे भुलाने में
वो निस्फ़ माज़ी का क़िस्सा था निस्फ़ हाल का था
इनाम-उल-हक़ जावेद
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वो डिग्री की बजाए मेम ले कर लौट आया है
मिला था दाख़िला जिस को समुंदर-पार कॉलेज में
इनाम-उल-हक़ जावेद
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अब किसी काम के नहीं ये रहे
दिल वफ़ा इश्क़ और तन्हाई
इंद्र सराज़ी
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और तो कोई था नहीं शायद
रात को उठ के मैं ही चीख़ा था
इंद्र सराज़ी
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बड़ी मुश्किल से बहलाया था ख़ुद को
अचानक याद तेरी आ गई फिर
इंद्र सराज़ी
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दिल के ख़ूँ से भी सींच कर देखा
पेड़ क्यूँ ये हरा नहीं होता
इंद्र सराज़ी
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