वफ़ा के बाब में कार-ए-सुख़न तमाम हुआ
मिरी ज़मीन पे इक मअरका लहू का भी हो
इफ़्तिख़ार आरिफ़
वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बेवफ़ाई में भी
मैं उस की क़ैद में हूँ क़ैद से रिहाई में भी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
वही चराग़ बुझा जिस की लौ क़यामत थी
उसी पे ज़र्ब पड़ी जो शजर पुराना था
इफ़्तिख़ार आरिफ़
वही फ़िराक़ की बातें वही हिकायत-ए-वस्ल
नई किताब का एक इक वरक़ पुराना था
इफ़्तिख़ार आरिफ़
वही है ख़्वाब जिसे मिल के सब ने देखा था
अब अपने अपने क़बीलों में बट के देखते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
वो हम नहीं थे तो फिर कौन था सर-ए-बाज़ार
जो कह रहा था कि बिकना हमें गवारा नहीं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
वो जिस के नाम की निस्बत से रौशनी था वजूद
खटक रहा है वही आफ़्ताब आँखों में
इफ़्तिख़ार आरिफ़

