सब लोग अपने अपने क़बीलों के साथ थे
इक मैं ही था कि कोई भी लश्कर मिरा न था
इफ़्तिख़ार आरिफ़
समझ रहे हैं मगर बोलने का यारा नहीं
जो हम से मिल के बिछड़ जाए वो हमारा नहीं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
समुंदर के किनारे एक बस्ती रो रही है
मैं इतनी दूर हूँ और मुझ को वहशत हो रही है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
समुंदरों को भी हैरत हुई कि डूबते वक़्त
किसी को हम ने मदद के लिए पुकारा नहीं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
शगुफ़्ता लफ़्ज़ लिक्खे जा रहे हैं
मगर लहजों में वीरानी बहुत है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
शिकम की आग लिए फिर रही है शहर-ब-शहर
सग-ए-ज़माना हैं हम क्या हमारी हिजरत क्या
इफ़्तिख़ार आरिफ़
सिपाह-ए-शाम के नेज़े पे आफ़्ताब का सर
किस एहतिमाम से परवर-दिगार-ए-शब निकला
इफ़्तिख़ार आरिफ़

