वुसअ'त तिलिस्म-ख़ाना-ए-आलम की क्या कहूँ
थक थक गई निगाह तमाशे न कम हुए
हीरा लाल फ़लक देहलवी
याद इतना है मिरे लब पे फ़ुग़ाँ आई थी
फिर ख़ुदा जाने कहाँ दिल की ये आवाज़ गई
हीरा लाल फ़लक देहलवी
दुआ ही वज्ह-ए-करामात थोड़ी होती है
ग़ज़ब की धूप में बरसात थोड़ी होती है
हिजाब अब्बासी
है जब तक दश्त-पैमाई सलामत
रहेगी आबला-पाई सलामत
हिजाब अब्बासी
हम इस शहर-ए-जफ़ा-पेशा से कुछ उम्मीद क्या रक्खें
यहाँ इस हाव-हू में ख़ामुशी को कौन लिक्खेगा
हिजाब अब्बासी
आया भी कोई दिल में गया भी कोई दिल से
आना नज़र आया न ये जाना नज़र आया
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
ऐ हिज्र वक़्त टल नहीं सकता है मौत का
लेकिन ये देखना है कि मिट्टी कहाँ की है
हिज्र नाज़िम अली ख़ान

