हाल बीमार का पूछो तो शिफ़ा मिलती है
या'नी इक कलमा-ए-पुर्सिश भी दवा होता है
हीरा लाल फ़लक देहलवी
हम तो मंज़िल के तलबगार थे लेकिन मंज़िल
आगे बढ़ती है गई राहगुज़र की सूरत
हीरा लाल फ़लक देहलवी
क्या बात है नज़रों से अंधेरा नहीं जाता
कुछ बात न कर ली हो शब-ए-ग़म ने सहर से
हीरा लाल फ़लक देहलवी
लोग अंदाज़ा लगाएँगे अमल से मेरे
मैं हूँ कैसा मिरे माथे पे ये तहरीर नहीं
हीरा लाल फ़लक देहलवी
मैं ने अंजाम से पहले न पलट कर देखा
दूर तक साथ मिरे मंज़िल-ए-आग़ाज़ गई
हीरा लाल फ़लक देहलवी
मैं तिरा जल्वा तू मेरा दिल है मेरे हम-नशीं
मैं तिरी महफ़िल में हूँ और तू मिरी महफ़िल में है
हीरा लाल फ़लक देहलवी
मक़ाम-ए-बर्क़ जिसे आसमाँ भी कहते हैं
इरादा अब है वहाँ अपना घर बनाने का
हीरा लाल फ़लक देहलवी

