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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

तुलूअ होगा अभी कोई आफ़्ताब ज़रूर
धुआँ उठा है सर-ए-शाम फिर चराग़ों से

हज़ीं लुधियानवी




तुंदी-ए-सैल-ए-वक़्त में ये भी है कोई ज़िंदगी
सुब्ह हुई तो जी उठे, रात हुई तो मर गए

हज़ीं लुधियानवी




उतर के नीचे कभी मेरे साथ भी तो चलो
बुलंद खिड़कियों से कब तलक पुकारोगे

हज़ीं लुधियानवी




अब कहे जाओ फ़साने मिरी ग़र्क़ाबी के
मौज-ए-तूफ़ाँ को मिरे हक़ में था साहिल होना

हीरा लाल फ़लक देहलवी




ऐ शाम-ए-ग़म की गहरी ख़मोशी तुझे सलाम
कानों में एक आई है आवाज़ दूर की

हीरा लाल फ़लक देहलवी




अपना घर फिर अपना घर है अपने घर की बात क्या
ग़ैर के गुलशन से सौ दर्जा भला अपना क़फ़स

हीरा लाल फ़लक देहलवी




चराग़-ए-इल्म रौशन-दिल है तेरा
अंधेरा कर दिया है रौशनी ने

हीरा लाल फ़लक देहलवी