हवा के दोश पे उड़ती हुई ख़बर तो सुनो
हवा की बात बहुत दूर जाने वाली है
हसन अख्तर जलील
मैं न दरिया हूँ न साहिल न सफ़ीना न भँवर
दावर-ए-ग़म किसी साँचे में तो ढाले मुझ को
हसन अख्तर जलील
मुझ को 'जलील' कौन कहेगा शिकस्ता-दिल
खाया था एक ज़ख़्म सो वो बे-निशाँ रहा
हसन अख्तर जलील
सफ़ीने डूब गए कितने दिल के सागर में
ख़ुदा करे तिरी यादों की नाव चलती रहे
हसन अख्तर जलील
भटक रहा हूँ मैं इस दश्त-ए-संग में कब से
अभी तलक तो दर-ए-आईना खुला न मिला
हसन अज़ीज़
देखूँ वो करती है अब के अलम-आराई कि मैं
हारता कौन है इस जंग में तन्हाई कि मैं
हसन अज़ीज़
इक क़िस्सा-ए-तवील है अफ़्साना दश्त का
आख़िर कहीं तो ख़त्म हो वीराना दश्त का
हसन अज़ीज़

