ये जफ़ाओं की सज़ा है कि तमाशाई है तू
ये वफ़ाओं की सज़ा है कि पए-दार हूँ मैं
हामिद मुख़्तार हामिद
बे-वजह भी देखा है परेशाँ तुम्हें 'हामिद'
दीवाने भी लगते नहीं आशिक़ भी नहीं हो
हामिद सलीम
कितने ग़म हैं जो सर-ए-शाम सुलग उठते हैं
चारा-गर तू ने ये किस दुख की दवा भेजी है
हामिद सरोश
मैं ने भेजी थी गुलाबों की बशारत उस को
तोहफ़तन उस ने भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा भेजी है
हामिद सरोश
तुम्हारा नक़्श इन आँखों से धुलता भी तो कैसे
कि दरिया में वो पहली सी रवानी भी कहाँ थी
हामिद ज़हूर
फ़ज़ा यूँही तो नहीं मल्गजी हुई जाती
कोई तो ख़ाक-नशीं होश खो रहा होगा
हमीदा शाहीन
कौन बदन से आगे देखे औरत को
सब की आँखें गिरवी हैं इस नगरी में
हमीदा शाहीन

