दिल के सूने सेहन में गूँजी आहट किस के पाँव की
धूप-भरे सन्नाटे में आवाज़ सुनी है छाँव की
हम्माद नियाज़ी
हार दिया है उजलत में
ख़ुद को किस आसानी से
हम्माद नियाज़ी
हम ऐसे लोग जो आइंदा ओ गुज़िश्ता हैं
हमारे अहद को मौजूद से तही किया जाए
हम्माद नियाज़ी
हम इस ख़ातिर तिरी तस्वीर का हिस्सा नहीं थे
तिरे मंज़र में आ जाए न वीरानी हमारी
हम्माद नियाज़ी
कब मुझे उस ने इख़्तियार दिया
कब मुझे ख़ुद पे इख़्तियार आया
हम्माद नियाज़ी
कच्ची क़ब्रों पर सजी ख़ुशबू की बिखरी लाश पर
ख़ामुशी ने इक नए अंदाज़ में तक़रीर की
हम्माद नियाज़ी
मैं अपने बाप के सीने से फूल चुनता हूँ
सो जब भी साँस थमी बाग़ में टहल आया
हम्माद नियाज़ी

