ऐसी ऊँची भी तो दीवार नहीं घर की तिरे
रात अँधेरी कोई आवेगी न बरसात में क्या
हैदर अली आतिश
अजब तेरी है ऐ महबूब सूरत
नज़र से गिर गए सब ख़ूबसूरत
हैदर अली आतिश
अमरद-परस्त है तो गुलिस्ताँ की सैर कर
हर नौनिहाल रश्क है याँ ख़ुर्द-साल का
हैदर अली आतिश
ब'अद फ़रहाद के फिर कोह-कनी मैं ने की
ब'अद मजनूँ के किया मैं ने बयाबाँ आबाद
हैदर अली आतिश
बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक क़तरा-ए-ख़ूँ न निकला
हैदर अली आतिश
बहर-ए-हस्ती सा कोई दरिया-ए-बे-पायाँ नहीं
आसमान-ए-नील-गूँ सा सब्ज़ा-ए-साहिल कहाँ
हैदर अली आतिश
बंदिश-ए-अल्फ़ाज़ जड़ने से निगूँ के कम नहीं
शाएरी भी काम है 'आतिश' मुरस्सा-साज़ का
हैदर अली आतिश

