बरहमन खोले हीगा बुत-कदा का दरवाज़ा
बंद रहने का नहीं कार-ए-ख़ुदा-साज़ अपना
हैदर अली आतिश
बस्तियाँ ही बस्तियाँ हैं गुम्बद-ए-अफ़्लाक में
सैकड़ों फ़रसंग मजनूँ से बयाबाँ रह गया
हैदर अली आतिश
बयाँ ख़्वाब की तरह जो कर रहा है
ये क़िस्सा है जब का कि 'आतिश' जवाँ था
हैदर अली आतिश
भरा है शीशा-ए-दिल को नई मोहब्बत से
ख़ुदा का घर था जहाँ वाँ शराब-ख़ाना हुआ
हैदर अली आतिश
दिल की कुदूरतें अगर इंसाँ से दूर हों
सारे निफ़ाक़ गब्र ओ मुसलमाँ से दूर हों
हैदर अली आतिश
दोस्तों से इस क़दर सदमे उठाए जान पर
दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा
हैदर अली आतिश
दुनिया ओ आख़िरत में तलबगार हैं तिरे
हासिल तुझे समझते हैं दोनों जहाँ में हम
हैदर अली आतिश

