क्या जाने क्या सबब है कि जी चाहता है आज
रोते ही जाएँ सामने तुम को बिठा के हम
हफ़ीज़ मेरठी
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मय-ख़ाने की सम्त न देखो
जाने कौन नज़र आ जाए
हफ़ीज़ मेरठी
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रात को रात कह दिया मैं ने
सुनते ही बौखला गई दुनिया
हफ़ीज़ मेरठी
रसा हों या न हों नाले ये नालों का मुक़द्दर है
'हफ़ीज़' आँसू बहा कर जी तो हल्का कर लिया मैं ने
हफ़ीज़ मेरठी
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शैख़ क़ातिल को मसीहा कह गए
मोहतरम की बात को झुटलाएँ क्या
हफ़ीज़ मेरठी
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शीशा टूटे ग़ुल मच जाए
दिल टूटे आवाज़ न आए
हफ़ीज़ मेरठी
सिर्फ़ ज़बाँ की नक़्क़ाली से बात न बन पाएगी 'हफ़ीज़'
दिल पर कारी चोट लगे तो 'मीर' का लहजा आए है
हफ़ीज़ मेरठी
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