यार गर पूछे तो कीजे कुछ अर्ज़
बात पर बात कही जाती है
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
बग़ैर सम्त के चलना भी काम आ ही गया
फ़सील-ए-शहर के बाहर भी एक दुनिया थी
गुलनार आफ़रीन
दिल का हर ज़ख़्म तिरी याद का इक फूल बने
मेरे पैराहन-ए-जाँ से तिरी ख़ुशबू आए
गुलनार आफ़रीन
एक आँसू याद का टपका तो दरिया बन गया
ज़िंदगी भर मुझ में एक तूफ़ान सा पलता रहा
गुलनार आफ़रीन
एक परछाईं तसव्वुर की मिरे साथ रहे
मैं तुझे भूलूँ मगर याद मुझे तू आए
गुलनार आफ़रीन
'गुलनार' मस्लहत की ज़बाँ में न बात कर
वो ज़हर पी के देख जो सच्चाइयों में है
गुलनार आफ़रीन
हम सर-ए-राह-ए-वफ़ा उस को सदा क्या देते
जाने वाले ने पलट कर हमें देखा भी न था
गुलनार आफ़रीन

