EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

और रब्त जिसे कुफ़्र से है या'नी बरहमन
कहता है कि हरगिज़ मिरा ज़ुन्नार न टूटे

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी




बहार इस धूम से आई गई उम्मीद जीने की
गरेबाँ फट चुका कुइ दम में अब नौबत ही सीने की

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी




देखना ज़ोर ही गाँठा है दिल-ए-यार से दिल
संग-ओ-शीशे को किया है मैं हुनर से पैवंद

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी




दीन ओ दुनिया का जो नहीं पाबंद
वो फ़राग़त तमाम रखता है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी




ग़ैर वफ़ा में पुख़्ता हैं यूँ ही सही प मुझ सा भी
एक तिरी जनाब में ख़ाम रहा तो क्या हुआ

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी




गर शैख़ अज़्म-ए-मंज़िल-ए-हक़ है तो आ इधर
है दिल की राह सीधी व का'बे की राह कज

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी




हाजी तू तो राह को भूला मंज़िल को कोई पहुँचे है
दिल सा क़िबला छोड़ के तू ने का'बे का एहराम किया

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी