अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार
पीले पत्ते तलाश करती है
गुलज़ार
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अपने साए से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा
गुलज़ार
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भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में
उजाला हो तो हम आँखें झपकते रहते हैं
गुलज़ार
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चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं
दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें
गुलज़ार
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चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआँ
गुलज़ार
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देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई
गुलज़ार
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दिल पर दस्तक देने कौन आ निकला है
किस की आहट सुनता हूँ वीराने में
गुलज़ार

