कब इस जी की हालत कोई जानता है
जो जी जानता है सो जी जानता है
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
कभी हाथ भी आएगा यार सच कह
या यूँही तू बातें बनाता रहेगा
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
कहूँ कि शैख़-ए-ज़माना हूँ लाफ़ तो ये है
मैं अपने बुत का बरहमन हूँ साफ़ तो ये है
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
करूँ क़त्-ए-उल्फ़त बुतों से व-लेकिन
ये काफ़िर मिरा दिल नहीं मानता है
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
नाचार है दिल ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर के आगे
दीवाने का क्या चलता है ज़ंजीर के आगे
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
शब-ए-हिज्र में एक दिन देखना
अगर ज़िंदगी है तो मर जाएँगे
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
तुझ बिन इक दल हो पास रहता है
वो भी अक्सर उदास रहता है
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

