रास आती ही नहीं जब प्यार की शिद्दत मुझे
इक कमी अपनी मोहब्बत में कहीं रक्खूँगा मैं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
रुका हूँ किस के वहम में मिरे गुमान में नहीं
चराग़ जल रहा है और कोई मकान में नहीं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
सितारा-ए-ख़्वाब से भी बढ़ कर ये कौन बे-मेहर है कि जिस ने
चराग़ और आइने को अपने वजूद का राज़-दाँ किया है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
तड़प उठी है किसी नगर में क़याम करने से रूह मेरी
सुलग रहा है किसी मसाफ़त की बे-कली से दिमाग़ मेरा
ग़ुलाम हुसैन साजिद
उस के होने से हुई है अपने होने की ख़बर
कोई दुश्मन से ज़ियादा लाएक़-ए-इज़्ज़त नहीं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
ये आब-ओ-ताब इसी मरहले पे ख़त्म नहीं
कोई चराग़ है इस आइने से बाहर भी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
ये सच है मेरी सदा ने रौशन किए हैं मेहराब पर सितारे
मगर मिरी बे-क़रार आँखों ने आइने का ज़ियाँ किया है
ग़ुलाम हुसैन साजिद

