दयार-ए-यार का शायद सुराग़ लग जाता
जुदा जो जादा-ए-मक़सूद से सफ़र होता
ग़ुलाम मौला क़लक़
दिल के हर जुज़्व में जुदाई है
दर्द उठे आबला अगर बैठे
ग़ुलाम मौला क़लक़
फ़िक्र-ए-सितम में आप भी पाबंद हो गए
तुम मुझ को छोड़ दो तो मैं तुम को रिहा करूँ
ग़ुलाम मौला क़लक़
गली से अपनी इरादा न कर उठाने का
तिरा क़दम हूँ न फ़ित्ना हूँ मैं ज़माने का
ग़ुलाम मौला क़लक़
है अगर कुछ वफ़ा तो क्या कहने
कुछ नहीं है तो दिल-लगी ही सही
ग़ुलाम मौला क़लक़
हम उस कूचे में उठने के लिए बैठे हैं मुद्दत से
मगर कुछ कुछ सहारा है अभी बे-दस्त-ओ-पाई का
ग़ुलाम मौला क़लक़
हर संग में काबे के निहाँ इश्वा-ए-बुत है
क्या बानी-ए-इस्लाम भी ग़ारत-गर-ए-दीं था
ग़ुलाम मौला क़लक़

