कभी मोहब्बत से बाज़ रहने का ध्यान आए तो सोचता हूँ
ये ज़हर इतने दिनों से मेरे वजूद में कैसे पल रहा है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
किसी की याद से दिल का अंधेरा और बढ़ता है
ये घर मेरे सुलगने से मुनव्वर हो नहीं सकता
ग़ुलाम हुसैन साजिद
किसी ने फ़क़्र से अपने ख़ज़ाने भर लिए लेकिन
किसी ने शहरयारों से भी सीम-ओ-ज़र नहीं पाए
ग़ुलाम हुसैन साजिद
लौट जाने की इजाज़त नहीं दूँगा उस को
कोई अब मेरे तआक़ुब में अगर आता है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मैं एक मुद्दत से इस जहाँ का असीर हूँ और सोचता हूँ
ये ख़्वाब टूटेगा किस क़दम पर ये रंग छूटेगा कब लहू से
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मैं हूँ मगर आज उस गली के सभी दरीचे खुले हुए हैं
कि अब मैं आज़ाद हो चुका हूँ तमाम आँखों के दाएरों से
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मैं रिज़्क़-ए-ख़्वाब हो के भी उसी ख़याल में रहा
वो कौन है जो ज़िंदगी के इम्तिहान में नहीं
ग़ुलाम हुसैन साजिद

