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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

मता-ए-बर्ग-ओ-समर वही है शबाहत-ए-रंग-ओ-बू वही है
खुला कि इस बार भी चमन पर गिरफ़्त-ए-दस्त-ए-नुमू वही है

ग़ुलाम हुसैन साजिद




मेरी क़िस्मत है ये आवारा-ख़िरामी 'साजिद'
दश्त को राह निकलती है न घर आता है

ग़ुलाम हुसैन साजिद




मिल नहीं पाती ख़ुद अपने-आप से फ़ुर्सत मुझे
मुझ से भी महरूम रहती है कभी महफ़िल मिरी

ग़ुलाम हुसैन साजिद




मिरे मायूस रहने पर अगर वो शादमाँ है
तो क्यूँ ख़ुद को मैं उस के वास्ते बर्बाद कर दूँ

ग़ुलाम हुसैन साजिद




मिरी विरासत में जो भी कुछ है वो सब इसी दहर के लिए है
ये रंग इक ख़्वाब के लिए है ये आग इक शहर के लिए है

ग़ुलाम हुसैन साजिद




नशात-ए-इज़हार पर अगरचे रवा नहीं ए'तिबार करना
मगर ये सच है कि आदमी का सुराग़ मिलता है गुफ़्तुगू से

ग़ुलाम हुसैन साजिद




रास आई है न आएगी ये दुनिया लेकिन
रोक रक्खा है मुझे कूच की तय्यारी ने

ग़ुलाम हुसैन साजिद