उस के बारे में बहुत सोचता हूँ
मुझ से बिछड़ा तो किधर जाएगा
फ़रहत अब्बास शाह
उसे ज़ियादा ज़रूरत थी घर बसाने की
वो आ के मेरे दर-ओ-बाम ले गया मुझ से
फ़रहत अब्बास शाह
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आ मुझे छू के हरा रंग बिछा दे मुझ पर
मैं भी इक शाख़ सी रखता हूँ शजर करने को
फ़रहत एहसास
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आँखों की प्यालियों में बारिश मची हुई है
सहरा में कोई मंज़र शादाब आ रहा है
फ़रहत एहसास
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आँख भर देख लो ये वीराना
आज कल में ये शहर होता है
फ़रहत एहसास
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अब देखता हूँ मैं तो वो अस्बाब ही नहीं
लगता है रास्ते में कहीं खुल गया बदन
फ़रहत एहसास
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ऐ ख़ुदा मेरी रगों में दौड़ जा
शाख़-ए-दिल पर इक हरी पत्ती निकाल
फ़रहत एहसास
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