जली हैं धूप में शक्लें जो माहताब की थीं
खिंची हैं काँटों पे जो पत्तियाँ गुलाब की थीं
दाग़ देहलवी
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जल्वे मिरी निगाह में कौन-ओ-मकाँ के हैं
मुझ से कहाँ छुपेंगे वो ऐसे कहाँ के हैं
दाग़ देहलवी
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जिन को अपनी ख़बर नहीं अब तक
वो मिरे दिल का राज़ क्या जानें
दाग़ देहलवी
जिस जगह बैठे मिरा चर्चा किया
ख़ुद हुए रुस्वा मुझे रुस्वा किया
दाग़ देहलवी
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जिस ख़त पे ये लगाई उसी का मिला जवाब
इक मोहर मेरे पास है दुश्मन के नाम की
दाग़ देहलवी
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जो गुज़रते हैं 'दाग़' पर सदमे
आप बंदा-नवाज़ क्या जानें
दाग़ देहलवी
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जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूटे वादे करता
तुम्हीं मुंसिफ़ी से कह दो तुम्हें ए'तिबार होता
दाग़ देहलवी
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